बिखरे मोती

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गद्दार

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शेरू वहाँ की हिन्दू और मुसलमान बस्तियों से समभाव रखता था; खाने की तलाश में दिन भर दोनों बस्तियों में भटकता रहता और पेट भर जाने पर वहीं आसपास किसी कोने में बैठा कर आराम करता या सोता रहता।

यहाँ रहने वाले लक्ष्मण और रहीम शाम को जब भी काम से लौटते तो अपने टिफिन में बची रोटी उसे देना नहीं भूलते थे। शेरू भी दोनों का इन्तजार करता और जैसे ही इनमें से किसी को भी आते देखता पूँछ हिलाकर उसका स्वागत करता।

एक दिन अफवाहों के चलते पूरा शहर सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया। दोनों बस्तियों के लोग भी उन्माद में एक-दूसरे के ऊपर पथराव करने लगे। इस पत्थरबाजी से शेरू भी थोड़ा घबराया हुआ था। तभी उसकी नज़र थोड़ी दूर पर खड़े रहीम और लक्ष्मण पर पड़ी। वह हुलस कर उनकी तरफ बढ़ा। कूँ–कूँ की आवाज निकाल कर उसने उनका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने का एक असफल प्रयास किया। तभी अचानक क्रोध पूर्ण मुद्रा में रहीम लक्ष्मण की तरफ लपका। रहीम को अपने ऊपर हमला करते देख लक्ष्मण भी उससे भिड़ गया। शेरू कुछ देर तक तो दोनों को लड़ते देखता रहा और फिर वह भी उनकी लड़ाई में कूद पड़ा।

यह कहना तो मुश्किल था कि वह किसकी तरफ था लेकिन उसने लपक कर जो टाँग सबसे पहले अपने मुँह में पकड़ी वह इतेफाक से रहीम की थी। शेरू के इस अप्रत्याशित हमले से रहीम हड़बड़ा गया और उससे से अपनी टाँग छुड़ा उसे कोसता हुआ अपनी बस्ती की तरफ भागा। रहीम को वहाँ से भागते देख लक्ष्मण ने उस पर पीछे से हमला किया, लेकिन इसके पहले कि वह रहीम तक पहुँच पाता शेरू ने झपट कर इस बार उसकी टाँग को मुँह में दबा लिया। किसी तरह शेरू से अपनी टाँग को छुड़ा कर लक्ष्मण भी उसे कोसते हुए अपनी बस्ती की तरफ भाग गया।

शहर के हालात सामान्य होने पर एक शाम रहीम को आते देख शेरू ख़ुशी से उसके पास जाकर पूँछ हिलाने लगा। शेरू को देख कर रहीम गुस्से में उसे पत्थर मारते हुए चिल्लाया, “ स्साले …. उसी से रोटी माँग जिसे बचाने के लिए मेरी टाँग में काटा था।” शेरू सहम कर पीछे हट गया।

तभी उसे लक्ष्मण आता दिखाई दिया। शेरू दौड़ कर उसके पास गया लेकिन लक्ष्मण ने भी उसे पत्थर मारते हुए कहा, “ भाग स्साले .. उसी से रोटी माँग जिसको बचाने के लिए मुझे काटा था।”

शेरू के लिए उन दोनों का यह बदला हुआ रूप अप्रत्याशित था। वह दूर बैठा दोनों को जाता देख रहा था और सोच रहा था कि उसने क्या गलत किया है।



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