बिखरे मोती

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एक विश्लेषण : बिहार की चुनावी हार जीत

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इलेक्शन कमीशन की बिहार की चुनावी घोषणा के बाद जब विभिन्न दलों ने अपने – अपने चुनावी बिगुल बजाये तो देश को पूरा विश्वास था कि इस बार का यह चुनाव केवल विकास के मुद्दे को लेकर ही लड़ा जाएगा और जिसके चलते बीजेपी का पलड़ा शायद ज्यादा भारी रहेगा I जहां बीजेपी के पास अपना केंद्र में  १८ महीने के विकास के विषय में बताने का विकल्प था वहीं जद(U) के पास बिहार में पिछले दस वर्षों में इसकी सरकार द्वारा किये गए विभिन्न विकास के कार्यों को बताने का विकल्प था I यद्यपि इन दस वर्षों में लगभग साढ़े आठ वर्ष तक बीजेपी जद(U) के साथ थी लेकिन उसने अपने इस कार्यकाल को बिलकुल ही भूला दिया I शायद उसके शीर्षस्थ नेताओं का यह मानना रहा होगा कि बीजेपी के लिए अपने जद(U) के साढ़े आठ वर्षों के साथ को नकारने से शायद वें जनता के दिल में अपने लिए हमदर्दी बना पाएंगे I चुनाव के पास आते – आते यह निश्चित हो गया था कि मुकाबला मुख्यतः दो गठबन्धनों के बीच यानी NDA और जद(U) तथा रजद के महा गठबंधन के बीच ही है I धीरे – धीरे चुनावी मुद्दों में विकास के मुद्दे के ऊपर  अन्य मुद्दे जैसे  जाति , सम्प्रदाय , बिहारी बनाम बाहरी , आरक्षण इत्यादि हावी होते चले गए I

मेरी दृष्टि में निम्न कारणों की वजह से बीजेपी को अभी हाल में हुए बिहार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा :-

1 . बीजेपी का जन आधार का केवल शहरी सीमाओं तक ही सीमित होना : यह बीजेपी की सबसे पुरानी कमजोरी रही है  I जन संघ पार्टी जो बीजेपी की जन्म दात्री पार्टी है उस की विफलता का भी यही मुख्य कारण था I यह पार्टी भी केवल शहरों तक ही सीमित थी तथा इसका जनाधार देश के गाँव में बिल्कुल नहीं के बराबर था I यही परम्परा बीजेपी को भी विरासत में मिली I जिस समय बीजेपी की सरकार अटल जी  के नेतृत्व में बनी उस समय लोगों का आक्रोश कांग्रेस के विरुद्ध था जिसके कारण लोगों ने बीजेपी को वोट दिया I लेकिन जीतने के बाद बीजेपी ने अपना कार्य क्षेत्र केवल शहरों तक ही सीमित रखा जिसके कारण अच्छा काम करने के बाद भी बीजेपी अगला चुनाव नहीं जीत पायी I शायद इसका आभास इसे २०१० का इलेक्शन हार जाने के बाद हुआ जिसके फलस्वरूप इसने अपने पैर गाँव में फैलाए जिसको मैंने प्रत्यक्ष रूप में २०१२ में देखा जब मैं स्वयं कुछ ग्रामीण क्षेत्रों के संपर्क में आया I इस का नतीजा बीजेपी को २०१४ के चुनावों में सीधे तौर पर  हुआ I बिहार चुनावों में बीजेपी की यही  कमी फिर उभर कर आई I इसके नेताओं ने अधिकतम प्रचार शहरी क्षेत्रों में किया जबकि इसके विपरीत नीतीश कुमार ने बड़ी – बड़ी रैली न कर छोटी –छोटी रैली ज्यादा की और वो भी अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में की और जिसका फायदा उन्हें मिला I

2 . बिहार में बीजेपी  के किसी स्थानीय बड़े चेहरे का न होना :-  बीजेपी की हार का एक बड़ा कारण यह भी था कि उसके पास कोई आगे करने के लिए एक भी स्थानीय चेहरा नहीं था जो बीजेपी को जीत का भरोसा दिला सकता I हालाँकि बीजेपी चुनाव के शुरू से ही इस सवाल को यह कह कर टालती रही कि उनके यहाँ ऐसी प्रथा नहीं है जब कि वें इस प्रथा को २०१४ के चुनाव में मोदी जी को प्रधान मंत्री का चेहरा देकर ही चुनाव लड़ चुके थे I यदि बीजेपी ने किसी स्थानीय चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा होता तो उसे ज्यादा सीट मिली होती I मोदी जी के चेहरे के साथ चुनाव लड़ने से बीजेपी को कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि “बिहार का या बाहर का” इस नारे के चलते मोदी जी बिहार की जनता के दिल में अपनी पैठ नहीं बना सके I

3 . प्रचार के दौरान बीजेपी के प्रचारकों को द्वारा अशिष्ट शब्दावली का प्रयोग :- बीजेपी के प्रचारकों ने ऐसे -२ अशिष्ट शब्दों द्वारा अपने  विपक्षियों पर कटाक्ष किये जिनकी  बीजेपी के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से किसी को भी उम्मीद नहीं थी  I यह सत्य है कि लालू प्रसाद ने इन कटाक्षों का जवाब उसी निम्न स्तर पर आकर दिया जो बिलकुल उचित नहीं कहा जा सकता था लेकिन लालू से लोग ऐसी भाषा के प्रयोग की उम्मीद कर सकते थे I जबकि नीतीश कुमार ने इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग से अपने आपको बचाए रखा और अपनी परिपक्वता का परिचय दिया जो उसे चुनाव में ज्यादा वोट दिलाने में सहायक हुई I

4 . बिहार में नीतीश कुमार की छवि :- बिहार में नीतीश कुमार की छवि एक साफ़ सुथरे नेता के रूप में उभरी I बहुत प्रयास के बाद भी बीजेपी या उनके अन्य विरोधी उनकी इस छवि को धूमिल करने में बिल्कुल असफल रहे और इसका परिणाम ये हुआ कि नीतीश कुमार के जो समर्थक थे वें अंत समय तक उनके समर्थक ही रहे I

5.  बीजेपी जनता के सामने अपने विकास के मुद्दे को रख पाने में असफल :-   बीजेपी अपने डेढ़ साल के  केंद्र में शासन करने के बाद भी बिहार की जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल नहीं हो पाई कि उन्होंने देश के विकास के लिए कुछ किया है I

6 . देश में बीफ और आपसी सौहार्द खराब कर लोगों को अपनी तरफ करना :-  बीजेपी को मुजफ्फरनगर के दंगों के फलस्वरूप  2014 के चुनावों में मिली सफलता के चलते इसी चाल के आधार पर बीजेपी ने बिहार के चुनाव भी जितने की सोची थी लेकिन इसकी यह चाल बुरी तरह विफल हुई I बीजेपी बिहार की जनता को धर्म के आधार पर बांटने में सफल नहीं हो पायी I

7 . जातिगत आधार पर बिहार के वोटरों को बांटना :- बिहार की जनता को बांटने के लिए बीजेपी ने अति दलित का कार्ड चला और इनके स्टार प्रचारक ने अपने आपको बार – बार अति दलित तबके से कह कर लोगों की सहानुभूति अपनी तरफ करने का पूरा प्रयास किया जिसके कारण वोटों में कुछ ध्रुवीकरण हुआ भी लेकिन यह ध्रुवीकरण बीजेपी के फायदे में न जाकर रजद और जद (U) के फायदे में गया I

8 . अपनी विपक्षी पार्टियों की ताकत को बहुत कम आंकना :-  बीजेपी की स्थानीय इकाइयों द्वारा बिहार की वास्तविक स्थिति से अवगत न करा कर केवल बिहार की एक मनभावन चित्र ही अपने केन्द्रीय नेतृत्व के सामने पेश किया और केन्द्रीय नेतृत्व ने भी इस की पुष्टि अन्य स्रोतों से न करा कर स्थानीय इकाइयों पर ही पूर्ण रूप से विश्वास कर चुनाव लड़ने की रूप रेखा तैयार की जो एक बड़ी विफलता के रूप में सामने आई I

9 . आरक्षण के विषय में असमय दिया गया संघ प्रमुख का बयान:- संघ प्रमुख श्री भगवत का बयान कि जातीय आधार पर आरक्षण की पुनः निरीक्षण की आवश्यकता है एक ऐसे समय पर आया जब लोगों को ऐसे वक्तव्य की कोई भी उम्मीद नहीं थी I यह वक्तव्य बिहार में बीजेपी के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हुआ I संघ प्रमुख ने यह वक्तव्य क्या सोच कर दिया यह तो बताना मुश्किल है लेकिन बिहार की जनता में इसका सीधा सन्देश यह गया कि बीजेपी आरक्षण नीति में  बुनियादी बदलाव करना चाहती है I बीजेपी ने काफी प्रयास किया अपने आपको इस वक्तव्य से दूर रखने का लेकिन साधारण लोगों को यह ज्ञात है कि बीजेपी की नीति निर्धारण में संघ का बहुत बड़ा हाथ है I

10 . समय के साथ मोदी जी के भाषणों का लोगों पर प्रभाव कम हो जाना :- मोदी जी का बहुत ज्यादा जनता के बीच में आने से उनका जनता पर प्रभाव कम हुआ I उनके भाषणों में नयापन धीरे – धीरे कम हो रहा था और इस की शुरुआत दिल्ली चुनावों से ही हो चुकी थी लेकिन बीजेपी नेतृत्व इस बात का संज्ञान लेने में क्यों असफल रहा यह बहुत ही आश्चर्य की बात है I उनके अधिकतर भाषण पूर्व भाषणों की प्रति लिपि से प्रतीत होते थे और उनके बिहार चुनाव के दौरान दिए गए भाषण वहां की जनता को प्रभावित करने में शायद पूर्णतया असफल सिद्ध हुए I

11 . बिहार के लिए १.२५ करोड़ का पैकेज की घोषणा करने का प्रधान मंत्री का तरीका :-  चुनावों के मौसम में इस तरह के पैकेज की घोषणा करना एक आम बात है लेकिन जिस तरह से मंच से बोलकर मोदी जी ने पैकेज की घोषणा की थी उस समय उनके चेहरे के भाव और भाषा कुछ इस तरह का सन्देश दे रहे थे जैसे पुराने समय में राजा महाराजा अपनी प्रजा पर तरस खाकर कुछ रियायतों की घोषणा कर देते थे और शायद उनके यही भाव बिहार की जनता को पसंद नहीं आये I



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
November 29, 2015

आदरणीय अरुण गुप्ता जी, आपने अच्छा ही विश्लेषण किया है पर उसका समय अब बीत गया. अब तो नीतीश की नयी टीम से उम्मीदें रखनी है की वे क्या क्या कर पा रहे हैं. उनकी छवि जरूर अच्छी है नयी टीम के साथ सामंजस्य ठीक ठाक रहेगा तभी बिहार आगे बढ़ेगा अन्यथा … नीतीश बबऊ अपनी जमीन गँवाएँगे. अभी कुछ कुछ घोषणा कर रहे हैं. विधान सभा का सत्र में कुछ और पता चलेगा….सादर!

Dr S Shankar Singh के द्वारा
November 29, 2015

मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. . मैं यह नहीं समझ पाता हूँ की बी जे पी की हार के लिए जो कारण हमको और आप को नज़र आते हैं वो बी जे पी वालों को क्यों नज़र नहीं आते hain. आशा है बी जे पी वाले आपके विश्लेषण से कुछ seekhenge. .

arungupta के द्वारा
November 29, 2015

आदरणीय आपकी बात सही है कि अब इसका समय बीत गया है लेकिन मेरा प्रयास केवल इतना भर है कि बीजेपी अपनी हार से भविष्य के लिए कुछ सीखे न कि इसे एक बुरा स्वप्न समझ कर भुला दे I

arungupta के द्वारा
November 29, 2015

आदरणीय आपकी टिपण्णी के लिए धन्यवाद I

rameshagarwal के द्वारा
December 2, 2015

जय श्री राम अरुण गुप्ताजी आप्नेबहुत अच्छा लेख लिखा कुछ कारण और भी है लालू के परिवार का करियर डाव पर था इसलिए उसने बहुत म्हणत कर दलितों,अति पिछड़े औत मुसलमानों को आरक्षण और बीजेपी के नाम पर डरा कर अपने गटबंधन के लिए एक जुट वोट डरवाने में कामयाब रहा उसने जगह जगह जा कर मोदीजी के खिलाफ भय का वातावरण फैलाने में सफल रहा जबकि एनडीए के दलित नेता मन से प्रचार नाहे कर सके और मोदीजी के ऊपर निर्भय रहे.शायद बीजेपी इससे सबक लेगी

arungupta के द्वारा
December 3, 2015

आपकी टिपण्णी के लिए धन्यवाद I बीजेपी शायद इससे सबक लेगी मुझे भी ऐसी ही आशा है I


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