बिखरे मोती

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वर्ष 2016 में होने वाले चुनाव – एक पूर्वालोकन

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वर्ष 2016  में होने वाले विधान सभाओं के चुनावों की सरगर्मियां जो अभी कुछ दिन पहले तक केवल नेपथ्य तक ही सीमित थी निर्वाचन आयोग द्वारा चार पूर्ण और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावों की घोषणा के बाद खुल कर मुख्य रंगमंच पर दिखलाई पड़ने लगीI

चुनाव आयोग ने जिन राज्यों में चुनावों की घोषणा की है उन राज्य में सीटों की स्थिति निम्न प्रकार है –  (1) पोंडिचेरी कुल सीट 30 <राज्य सभा -1> (2) असम कुल सीट -126 <राज्य सभा -7> (3) पश्चिम बंगाल कुल सीट – 294 <राज्य सभा -16>  (4) तमिलनाडु कुल सीट -234 <राज्य सभा – 18> एवं  (5) केरल कुल सीट -140  <राज्य सभा -9> I इन सब राज्यों में  मिलाकर अभी 824 सीटो पर चुनाव होने हैI  चुनाव आयोग की अधिसूचना अनुसार इन राज्यों में चुनाव अप्रैल 4 ,2016 और मई 16 ,2016 के बीच कुल तैंतालीस दिनों में संपन्न होने हैंI

यूँ तो यें चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्त्वपूर्ण है किन्तु भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी के लिए यें चुनाव विशेष महत्व रखते हैंI इन राज्यों से कुल मिलाकर 51 सीट राज्य सभा के लिए आती है जो भारतीय जनता पार्टी की राज्य सभा में उसकी वर्तमान सीटो की संख्या को देखते हुए उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैI यें चुनाव कांग्रेस के लिए भी उसके अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए काफी महत्वपूर्ण हैंI

जहां एक ओर पिछला आम चुनाव बीजेपी द्वारा विकास के मुद्दे और भ्रष्टाचार समाप्त करने के नाम पर जीतने के बाद भी उसे पिछले दो वर्षों में दिल्ली और बिहार के चुनावों में तथा अन्य राज्यों के स्थानीय निकायों के चुनावों में भारी असफलता का सामना करना पड़ा वहीं दूसरी और कांग्रेस भी इन दो वर्षों में कुछ हासिल नहीं कर पाई I उसके पास न तो पिछले केंद्र के चुनाव में कोई विशेष मुद्दा था और न ही अब हैI यदि इन प्रदेशों में चुनावी आकलन करना है तो  बीजेपी और कांग्रेस के  साथ-साथ उन पार्टियों का संज्ञान भी लेना होगा जो अपने–अपने प्रदेश में एक बड़ा जनाधार रखती हैI

बीजेपी का जनाधार इस पार्टी की जन्मदात्री जनसंघ पार्टी के समय से लेकर अभी तक केवल शहरी आबादी और वह भी हिंदी प्रदेशों तक ही सीमित रहा हैI अपने पिछले दो वर्ष के कार्य काल में केंद्र की बीजेपी सरकार ने किसी भी ऐसी योजना की शुरुआत नहीं की जिसके चलते इसके ग्रामीण जनाधार में बढ़ोतरी होI हालांकि इस वर्ष के केन्द्रीय बज़ट में बीजेपी सरकार ने गाँव के लिए कुछ योजनाएं चालू करने की घोषणा की है लेकिन इसका कुछ फायदा इसे आने वाले चुनावों में होता नहीं दीख रहा हैI बीजेपी अपने पैर दक्षिण के राज्यों में फैलाने में भी कोई विशेष सफल नहीं हो पायी हैI कांग्रेस जो कभी दक्षिण राज्यों में एक बड़ी पार्टी की हैसियत रखती थी धीरे–धीरे वहां की राजकीय स्तर की पार्टियों के मजबूत होने से अपना जनाधार खोती चली गयीI पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस का प्रभाव भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में काफी कम हुआ हैI किसी पार्टी की चुनावों में हार जीत का दारोमदार काफी हद तक उसके ग्रामीण जनाधार पर निर्भर करता हैI

तमिलनाडु में दो प्रांतीय पार्टियों अन्ना डीएमके और डीएमके के सामने बीजेपी और कांग्रेस की उपस्थिति नगण्य सी हैI यहाँ से बीजेपी को ज्यादा सीट जीतने की आशा नहीं है जिसका अनुमान बीजेपी के नेताओं का इस राज्य के इलेक्शन के प्रति लगभग उदासीन से रवैये को देख कर आसानी से लगाया जा सकता हैI केरल में भी बीजेपी की स्थिति लगभग ऐसी ही हैंI पश्चिम बंगाल में मुख्यतः मुकाबला टीएमसी और वाम दलों के बीच है I बीजेपी और कांग्रेस में यहाँ तीसरे और चौथे स्थान के लिए मुकाबला हो सकता I यद्यपि असम में कांग्रेस की स्थिति बीजेपी से बेहतर है लेकिन यहाँ बीजेपी अन्य स्थानीय पार्टी जैसे असम गण परिषद इत्यादि से हाथ मिलकर अपनी सीटों में कुछ बढ़ोतरी अवश्य कर सकती हैI जहां तक पोंडिचेरी का प्रश्न है यहाँ पर भी क्षेत्रीय पार्टियां बड़ी पार्टियों से बेहतर स्थिति में हैI यहाँ पर कांग्रेस की स्थिति बीजेपी से बेहतर हैI उपरोक्त  के आधार पर  यह कहना तर्क संगत होगा कि इन चुनावों से बीजेपी और कांग्रेस को कोई विशेष लाभ होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैंI

बिहार की तरह इन राज्यों में भी बीजेपी और कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने के लिए कोई स्थानीय बड़ा चेहरा नहीं है जिसके दम पर यें दोनों पार्टियां इन राज्यों में चुनाव जीतने का दावा कर सकेI मोदी जी के चेहरे को आगे करके पिछले केंद्र के चुनाव में बीजेपी को बड़ी सफलता मिलने के बाद उसे लगा था कि मोदी जी के रूप में उसने एक तारनहार खोज लिया है लेकिन दिल्ली और फिर बिहार की हार ने उसकी इस खोज पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया हैI अपनी इस हार से बीजेपी को सतर्क हो कर उन राज्यों में जहां अगले दो वर्षों में चुनाव होने वाले थे स्थानीय चेहरों  को आगे लाना था लेकिन पार्टी ऐसा करने असमर्थ रहीI कांग्रेस तो बहुत पहले से ही एक परिवार की पार्टी बन कर  रह गयी हैI इन दोनों पार्टियों को इस बात का नुकसान आने वाले चुनावों में अवश्य देखने को मिल सकता हैI इस बिंदु को लेकर स्थानीय पार्टियों की स्थिति इन दोनों बड़ी पार्टियों से बेहतर है क्योंकि उनके स्थानीय चेहरे उन्हें वोट दिलाने में पूरी तरह सक्षम हैI

बीजेपी ने पिछला केंद्र का इलेक्शन विकास के मुद्दे को आगे रख कर जीता था लेकिन अपने लगभग दो वर्ष के शासन काल में बीजेपी इस मुद्दे को लेकर जनता में अपने प्रति विश्वास जगाने में बिलकुल असमर्थ रही हैI अब बीजेपी विकास के मुद्दे को पीछे कर नए-नए मुद्दे जैसे राष्ट्रवाद इत्यादि जिनसे आम जनता का जुड़ाव लगभग नहीं के बराबर है आगे कर चुनाव जीतने की रणनीति बनाने में जुटी है जो मेरे विचार से शायद ही कारगर साबित होI इसी तरह कांग्रेस के पास भी कोई विशेष मुद्दे नहीं है जिनके बलबूते वह आने वाले चुनावों में जीत का दम भर सकेI जहां एक ओर  बीजेपी और कांग्रेस दोनों बड़ी पार्टियों ने अपने आप को केन्द्रीय मुद्दों तक सीमित कर अपने आपको  राज्यों की राजनीति से दूर रखा है वही दूसरी ओर स्थानीय पार्टियां स्थानीय मुद्दों से जुड़ी रही और इसके बलबूते ही आज ये पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस के मुकाबले वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने में ज्यादा सक्षम हैंI

कुछ लोग इस बात को चाहे खुले तौर पर मानने से परहेज़ करें लेकिन यह सत्य है कि पिछले कुछ महीनों से देश में समाज के कई वर्गों में आपसी सौहार्द में काफी कमी आई हैI यह सोच के लिए  अलग मुद्दा हो सकता है कि इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है लेकिन यह भी एक तथ्य है कि  बीजेपी के कई नेताओं के बयानों के कारण बीजेपी पर इस आपसी सौहार्द को बिगाड़ने के आक्षेप लगातार लगते रहे  हैंI उधर कांग्रेस के नेता भी एक धर्म विशेष के लोगों को अपनी और आकर्षित करने के लिए आपसी सौहार्द के वातावरण को बिगाड़ने में अपना योगदान देने से पीछे नहीं हटते हैंI इन सब बातों से दोनों पार्टियों को थोडा बहुत लाभ तो हो सकता लेकिन यदि दोनों पार्टियां सोचती है कि आजकल की जागरूक जनता को ऐसे मुद्दों से बेवकूफ बनाकर चुनाव जीते जा सकते है तो ये इनकी बड़ी भूल होगीI इस बिगड़े आपसी सौहार्द का कुछ फायदा बीजेपी असम में स्थानीय पार्टियों से हाथ मिलकर उठा सकती है लेकिन अन्य राज्यों में उसे इसका कोई लाभ मिलता नज़र नहीं आ रहा हैI

अपनी राज्यों की स्थानीय इकाइयों की ताकत को कम आंकना बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों की एक बहुत बड़ी कमजोरी रही हैI दिल्ली और बिहार के चुनाव हारने के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की इस कमजोरी की ओर कुछ ध्यान दिया है या नहीं कहना मुश्किल हैI कांग्रेस की अपनी एक परम्परा रही है जिसके अनुसार जीत का सेहरा हमेशा एक परिवार के सदस्यों के सिर पर ही बंधता है और यदि पार्टी हार जाती है तो उस हार के लिए जिम्मेदार सारे पार्टी के कार्यकर्ता होते हैI  कांग्रेस की इस परम्परा के चलते कांग्रेस के बहुत से अच्छे और विश्वसनीय कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोह भंग होता जा रहा है और पार्टी धीरे-धीरे बिखरती जा रही हैI यदि बीजेपी या कांग्रेस को  भविष्य  में होने वाले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है तो इन्हें राज्यों की स्थानीय इकाइयों को मजबूत और सक्षम बनाना होगाI

मेरे इस कथन से बहुत से लोग सहमत नहीं होंगे या हो सकता है कुछ लोग नाराज भी हो जाए कि समय के साथ-साथ मोदी जी के भाषणों का प्रभाव लोगों पर कम होता जा रहा हैI उनके भाषणों में नयापन धीरे–धीरे अब कम होता जा रहा है लेकिन बीजेपी नेतृत्व इस बात का संज्ञान लेने में क्यों असफल रहा है यह बहुत ही आश्चर्य की बात हैI अब उनके अधिकतर भाषण उनके पूर्व भाषणों की प्रतिलिपि से प्रतीत होते हैंI  पूर्व में भी उनके द्वारा बिहार चुनाव के दौरान दिए गए भाषण वहां की जनता को प्रभावित करने में पूर्णतया असफल सिद्ध हुए थेI होने वाले चुनावों में मोदी अपनी पार्टी को जिताने के लिए कितने कारगर सिद्ध होंगे यह आने वाला समय ही बताएगाI उधर राहुल गाँधी को भी कांग्रेस के लिए एक वोट बटोरने वाला अच्छा वक्ता नहीं माना जा सकता हैI

जातिगत आधार पर वोटरों को बांटकर चुनाव लड़ना भी भारत में एक परम्परा सी बन गया हैI सभी पार्टियां चाहे वो राष्ट्रीय स्तर की हो या राज्य स्तर की इस कार्ड का प्रयोग चुनाव जीतने के लिए अवश्य करती हैI बिहार के इलेक्शन में भी एक बड़ी पार्टी ने दलित का कार्ड चला था और इस पार्टी के स्टार प्रचारक ने अपने आपको बार–बार दलित तबके से कह कर लोगों की सहानुभूति अपनी तरफ करने का पूरा प्रयास कियाI इसके चलते वोटों में ध्रुवीकरण भी हुआ लेकिन यह ध्रुवीकरण बीजेपी के फायदे में न जाकर रजद और जद (U) के फायदे में चला गयाI  इस कार्ड के मद्देनज़र आजकल जिस तरह से हर पार्टी के नेतागण अपने आपको बाबा साहेब के करीब बताने या दिखाने का प्रयास कर रहें हैं उस हिसाब से इस कार्ड का लाभ आने वाले चुनावों में किसी एक पार्टी विशेष को मिलने की संभावनाएँ बहुत कम हैंI



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 22, 2016

आदरणीय अरुण गुप्ता जी, आप सही आकलन कर रहे हैं. आगामी चुनावों में न तो कोंग्रेस नहीं भाजपा को बहुत फायदा मिलने जा रहा है, परिणामत: क्षेत्रीय पार्टियां ही फायदे में रहनेवाली है. जनता परिणाम चाहती है. परिणाम देने में अभी तक मोदी सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठा सकी है. इधर बजट और बजट के बाद कुछ निर्णय माध्यम वर्ग को प्रभावित करणवाळा रहा है और मध्यम वर्ग ही भाजपा का वोटर रहा है जो खिसकने के कगार पर है…. सादर!

arungupta के द्वारा
March 23, 2016

श्रीमन , मैं आपके इस कथन से पूर्ण सहमत हूँ कि मध्यम वर्ग जो भाजपा का वोटर रहा है खिसकने के कगार पर है…सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
March 23, 2016

आपका आकलन तथ्यपरक है अरुण जी । असहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं । साथ ही मैं जवाहर जी के विचारों से भी सहमत हूँ । जनता का तो अब सभी से मोहभंग हो चला है लेकिन सार्थक विकल्प उपस्थित न हो तो जनता क्या करे ?

arungupta के द्वारा
March 23, 2016

आ० जितेन्द्र जी आपकी यह बात बिल्कुल सही है कि सार्थक विकल्प उपस्थित न हो तो जनता क्या करे I वास्तव में एक सार्थक विकल्प के आभाव में जनता के लिए एक बहुत ही द्विधा की स्थिति है ….आभार !

amit sharma के द्वारा
March 23, 2016

आ० अमित जी बीजेपी ने पिछला केंद्र का इलेक्शन विकास के मुद्दे को आगे रख कर जीता था लेकिन अपने लगभग दो वर्ष के शासन काल में बीजेपी इस मुद्दे को लेकर जनता में अपने प्रति विश्वास जगाने में बिलकुल असमर्थ रही हैI और कांग्रेस के बहुत से अच्छे और विश्वसनीय कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोह भंग होता जा रहा है और पार्टी धीरे-धीरे बिखरती जा रही हैI—-इन दोनों बातों  से सहमत हूँ… लेकिन आपका ये कहना कि बीजेपी अपना विस्तार करने में असफल रही है..सही नहीं है…क्योंकि जम्मू-कश्मीर, असम …हरियाणा…हर जगह बीजेपी आगे बढती हुई दिख रही है

arungupta के द्वारा
March 23, 2016

आ० अमित जी , विस्तार दो तरह से होता है एक लोगो के बीच पैठ बना कर पार्टी का विस्तार किया जाताहै और दूसरा अन्यों की अक्षमता का फायदा उठा कर सीटों में विस्तार किया जाता है I पहला विस्तार स्थाई होता जबकि दूसरा एक या अधिक से अधिक दो इलेक्शन तक ही चल पाता हैI मैं स्थाई विस्तार की बात में विशवास करता हूँ I असम और हरियाणा बीजेपी के लिए दूसरी श्रेणी के विस्तार का परिणाम है I जहां तक जम्मू कश्मीर की राजनीति की बात है वो शेष भारत की राजनीति से कुछ भिन्न है I जम्मू क्षेत्र में अधिकाँश हिन्दुओं ने बीजेपी को इसलिए वोट दिया कि शायद हिन्दुओं की वापसी कश्मीर घाटी में हो सके जो कांग्रेस कराने में बिलकुल असफल रही I अपने दो साल के शासन काल में बीजेपी भी इस मुद्दे पर अभी तक कुछ भी कर पाने में सफल नहीं हुई है I देखना है अब शेष तीन वर्षों में क्या होगा …आभार !

rameshagarwal के द्वारा
March 23, 2016

जय श्री राम अरुण जी मोदी जी की सरकार ने २ साल में बहुत से कार्य किये बजट में किसानो दलितों के लिए विशेष ध्यान दिया देश में आज एक ही मुद्दा रह गया मोदी विरोध इसीलिये लालू नितीश कांग्रेस एक जुट हो जाते आपने इन सेक्युलर ब्रिगेड के लिए एक भी शब्द निंदा का नहीं कहा जो विश्वविद्यालय में राष्ट्र विरोध का समर्थन करते ज़हरी भाषा बीजेपी से ज्यादा सेक्युलर ब्रिगेड के नेता बोलते मुस्लिम मारे जाते मीडिया सेक्युलर ब्रिगेड हल्ला मचाता परन्तु हिन्दुओ के मारे जाने पर सब चुप आपके विश्लेषण से कुछ हद तक सहमत है असम में बीजेपी जीत मिलेगी लेकिन केरल बंगाल में कुछ सीट्स ज्यादा आयेंगी ऐसी उम्मीद है तमिल नाडू केरला बंगाल में क्षेत्रीय दल शुरू से मजबूत है कांग्रेस तो डीएम के  से और वाम दलो से गठबंधन कर के सिधान्हीनता की हद पार कर दी आपको सेक्युलर नेताओ केजरीवाल,नितीश,लालू ममता के बारे में कहना चाइये था जो कुर्सी के लिए देश भी बेच दे.लेख के लिए आभार और बधाई .होली की शुभकामनाओ के साथ.

arungupta के द्वारा
March 23, 2016

आ० रमेश भाई आपको परिवार सहित होली की ढेर सारी शुभकामनाएं … आभार !

Shobha के द्वारा
March 26, 2016

श्री अरुण जी बहुत अच्छा विश्लेषण सही लिखा है आपने अब जरूरत हैमोदी सरकार ने क्या किया क्या करेंगे केवल मोदी जी की जय बोल क्र चुनाव जितना मुश्किल है ज्ञान वर्धक राजनितिक विश्लेषण

arungupta के द्वारा
March 26, 2016

आ० शोभा जी , ब्लॉग पर आपकी पॉजिटिव टिपण्णी के लिए आभार I मैंने अपने विश्लेषण में निष्पक्ष रहने का पूरा प्रयासकर केवल वास्तविक स्थिति को सामने रखने का प्रयास भर किया है I


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